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दिमाग का वो कोना जो आपको मारना चाहता है: ‘द कॉल ऑफ द वॉइड’ का रहस्य

श्रेणी: मानव मनोविज्ञान (Human Psychology) पढ़ने का समय: ४ मिनट

कल्पना कीजिए।

आप एक ऊंची इमारत की २०वीं मंजिल की बालकनी पर खड़े हैं। ठंडी हवा चल रही है। नीचे देखने पर गाड़ियाँ खिलौनों जैसी लग रही हैं और लोग चींटियों जैसे। नज़ारा बहुत खूबसूरत है।

आप रेलिंग (railing) को पकड़ते हैं और नीचे झांकते हैं।

अचानक... बिजली की तरह एक ख्याल आपके दिमाग में कौंधता है: "क्या होगा अगर मैं कूद जाऊं?" या शायद एक धीमी, डरावनी फुसफुसाहट: "छलांग लगा दो।"

आपके हाथ कांपने लगते हैं। आप झटके से पीछे हट जाते हैं। आपका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा है। पसीना छूट रहा है।

आप खुद से पूछते हैं: "मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूँ? क्या मैं पागल हो गया हूँ? मुझे तो जीने से प्यार है, फिर मेरे दिमाग ने मुझे खुद को मारने के लिए क्यों कहा?"

घबराइए मत। आप अकेले नहीं हैं। और आप पागल भी नहीं हैं। यह आपके दिमाग का एक 'डार्क सीक्रेट' है।


वह अनजानी आवाज़: "शून्य की पुकार" (The Call of the Void)

मनोविज्ञान की दुनिया में इस डरावने अहसास का एक बहुत ही खूबसूरत, लेकिन भयानक नाम है। फ्रेंच भाषा में इसे कहते हैं: L’appel du vide (लापेल दू वीद)

हिंदी में इसका मतलब है: शून्य की पुकार (The Call of the Void)

यह वह पल है जब एक सामान्य, स्वस्थ इंसान का दिमाग उसे कुछ बेहद खतरनाक करने के लिए उकसाता है।

  • कार चलाते वक्त अचानक ख्याल आना— "गाड़ी को उस ट्रक से टकरा दूँ तो?"

  • प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर सोचना— "ट्रेन के आगे कूद जाऊं तो?"

  • सब्जी काटते वक्त सोचना— "चाकू उंगली पर चला दूँ तो?"

लेकिन सवाल यह है—हमारा ही दिमाग, जिसका काम हमें जिंदा रखना (Survival) है, हमें मारने की बात क्यों करता है?


द ग्लिच: दिमाग के दो हिस्सों की लड़ाई

सच्चाई यह है कि यह ख्याल "आत्महत्या" की इच्छा नहीं है। यह आपके दिमाग के डर और तर्क (Logic) के बीच गलतफहमी (Misunderstanding) है।

इसे ऐसे समझिए:

  1. डर का सायरन: जब आप ऊंचाई पर खड़े होते हैं, तो आपके दिमाग का 'डर वाला हिस्सा' (Amygdala) खतरा महसूस करता है। वह चिल्लाता है— "खतरा है! पीछे हटो!"

  2. शरीर का रिएक्शन: आपका शरीर तुरंत अकड़ जाता है या संतुलन बनाने की कोशिश करता है। यह सब मिली-सेकंड में होता है।

  3. तर्क की गलती: आपका 'सोचने वाला दिमाग' (Conscious Brain) थोड़ा धीमा है। वह बाद में होश में आता है और देखता है कि शरीर कांप रहा है। वह कन्फ्यूज हो जाता है।

वह सोचता है: "अरे? मैं तो सुरक्षित रेलिंग के पीछे खड़ा हूँ, फिर मेरा शरीर कूदने की तैयारी क्यों कर रहा है? शायद... शायद मैं कूदना चाहता हूँ?"

आपका दिमाग अपनी ही घबराहट को गलत समझ लेता है और उसे "कूदने की इच्छा" का नाम दे देता है।

यानी, वो डरावनी आवाज़ मौत की नहीं, बल्कि जीने की तड़प की निशानी है। यह सबूत है कि आप मरना नहीं चाहते।


सस्पेंस: क्या हम अपने विचारों के गुलाम हैं?

लेकिन यह बात यहीं खत्म नहीं होती। यह घटना हमें इंसान होने के बारे में एक खौफनाक सच बताती है।

हम सोचते हैं कि हम अपने दिमाग के मालिक हैं। हम जो चाहे सोच सकते हैं, हम जो चाहे कर सकते हैं।

लेकिन 'द कॉल ऑफ द वॉइड' हमें याद दिलाता है कि स्टीयरिंग व्हील हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता। हमारे अवचेतन मन (Subconscious Mind) में ऐसे गहरे, अंधेरे कोने हैं जहाँ तक हमारी पहुँच नहीं है। वहां से कभी भी, कोई भी विचार सतह पर आ सकता है—बिन बुलाए, बिना किसी चेतावनी के।

अगली बार जब आप किसी ऊंची जगह पर खड़े हों और आपको वो "पुकार" सुनाई दे, तो याद रखिएगा...

वह केवल एक विचार है। वह हकीकत नहीं है। लेकिन वह एक चेतावनी है—कि आपका दिमाग एक ऐसा मशीन है जिसे आप पूरी तरह कभी नहीं समझ पाएंगे।


क्या आपको और सस्पेंस चाहिए?

क्या आपने कभी किसी भीड़भाड़ वाली जगह पर महसूस किया है कि सब लोग आपको घूर रहे हैं, जबकि असल में कोई नहीं देख रहा? इसे "Spotlight Effect" कहते हैं। क्या आप अगले ब्लॉग में इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक रहस्य जानना चाहेंगे?

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